रायपुर 9 जनवरी 10 (36गढ डाट इन) विकलांगता अभिशाप नहीं। इरादे बुलंद ओर मनोबल ऊंचा हो तो कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं।
इसी को परिभाषित कर रहे हैं बायें पांव से विकलांग घनश्याम देवांगन। छत्तीसगढ़ के गरियानंद पीपरछेड़ी निवासी घनश्याम देवानन्द अपने तीन अन्य विकलांग साथियों के साथ सायकिल से भारत भ्रमण पर निकले हुए हैं।
पेशे से शिक्षक घनश्याम देवांगन के भारत भ्रमण का उद्देश्य विकलांगता के प्रति हीन भावना को दूर करना है।
घनश्याम देवांगन एवं उनके दो अन्य सहयोगी मोतीलाल विश्वकर्मा और संतोष कुमार नाग छत्तीसगढ़ से सायकिल से भ्रमण करते हुए बिहार की राजधानी पटना पहुंच चुके हैं।
वहां से श्री देवांगन ने 36गढ़.इन को फोन कर बताया कि वे अब तक छत्तीसगढ़, ओडिसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार की दूरी नाप चुके हे।
इस महती कार्य के माध्यम से विकलांगता के प्रति दुर्भावना, साक्षरता का प्रचार और नशामुक्त समाज की स्थापना के लिए प्रयत्नशील हैं। श्री देवांगन के अनुसार विकलांगता अभिशाप नहीं।
बशर्ते व्यक्ति मानसिक रूप से विकलांग नहीं हों। यही संबल है कि वे प्रतिदिन 70 किलोमीटर सायकिल से दूरी तय करते हैं।
‘पंगु गिरि लांघे’ सुरदास की इस पंक्ति को चरितार्थ करते हुए श्री देवांगन और उनके साथी तीन दिसमबर 2009 को भारत भ्रमण पर निकले थे।
छह महीने में उन्हें 21 राज्यों ओर दस हजार तीन सौ पचीस किलोमीटर की दूरी तय करनी है। इससे पूर्व 1995 में भी घनश्याम देवांगन साक्षरता के प्रचार के लिए साइकिल द्वारा रायपुर से दिल्ली तक की यात्रा कर चुके हैं।
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