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Sat, 01 Sep 2007 11:03:00 +0000

उबाऊपन से दूर होती डॉक्युमेंट्री फ़िल्में



Film
डॉक्युमेंट्री फिल्म यानी वृत्तचित्र निर्माण की परंपरा छत्तीसगढ़ में करीब 1990 के आसपास मानी जाती है जब भिलाई के संतोष जैन ने ईरा फिल्म की स्थापना की।
रामशरण टंडन
किसी एक विषय को दृश्य एवं श्रव्य माध्यम से बयां करने की कला है डॉक्युमेंट्री फिल्म टीवी पर वृत्तचित्रों के प्रदर्शन शुरू होते ही चैनल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए अब वृत्त चित्र गीत-संगीत एवं कथा प्रसंग के चित्रण का मसाला मिलाया जाने लगा है।

इससे डॉक्युमेंट्री फिल्में न केवल रोचक बन पड़ती है बल्कि मनोरंजक कार्यक्रम में तब्दील हो जाती है। इस अंदाज में पर्यटन पर आधारित छत्तीसगढ़ एक झलक खूब पसंद की जा रही है।

 डॉक्युमेंट्री फिल्म यानी वृत्तचित्र निर्माण की परंपरा छत्तीसगढ़ में करीब 1990 के आसपास मानी जाती है जब भिलाई के संतोष जैन ने ईरा फिल्म की स्थापना की।

ईरा फिल्म द्वारा स्वतंत्र रूप से नवा सीख वृत्त चित्र का निर्माण किया गया और जिसे 10 मई 1991 को रायपुर दूरदर्शन केंद्र द्वारा प्रदर्शित किया गया। 1982 के लगभग वीडियो कैमरे के चलन से स्वतंत्र रूप से इस  दिशा में प्रयास शुरू हुए इससे पहले शासकीय विभाग द्वारा ही वृत्त चित्र बनाए जाते रहे हैं।

याद दिला दें कि रायपुर शहर में सबसे पहला व्ही.एच.एस.वीडियो कैमरे का व्यावसायिक उपयोग शुरू किया। सन् 1983 में उन्होंने वाडियो कैमरे से पहली छत्तीसगढ़ी वीडियो फिल्म जय माँ  बम्लेश्वरी का निर्माण किया इस दौरान बनी डॉक्युमेंट्री फिल्म के बारे में अधिकृत जानकारी नहीं है।

लेकिन 1991 के बाद से छत्तीसगढ़ में वृत्त चित्र निर्माण में तेजी आई। अब तक ईरा फिल्म ही करीब 150 से भी ज्यादा डॉक्युमेंट्री फिल्मों का निर्माण कर चुकी है ईरा फिल्म की ज्यादातर डॉक्युमेंट्री फिल्में दूरदर्शन के लिए निर्मित की गई।

वहीं स्वतंत्र रूप से केबल टीवी के लिए टीवी प्रोग्राम एवं वृत्त चित्र निर्माण की शुरूआत का श्रेय अंकित मूव्हीज के अजय शर्मा और अहफाज रशीद को है जिन्होंने केबल टीवी नेटवर्क के लिए 'जनउला'  का निर्माण किया 'जनउला' की यह जुगल जोड़ी टूटी तो तपेश जैन इसमें जुड़े और उन्होंने अजय शर्मा की बहुचर्चित डॉक्युमेंट्री फिल्म 'फिल्म फॉर गॉड' को शब्द दिया।

'ब्लड फार गाड' के बाद पर्यावरण विषय पर बनाई गई डॉक्युमेंट्री फिल्म भी बेहद चर्चा में रही है। याद दिला दें कि 'ब्लड फार गाड' में उड़ीसा के कालाहाण्डी की बलि प्रथा का पहली बार चित्रण किया था जिस पर बाद में ईएलटीवी के 'जनमत' कार्यक्रम के साथ ही प्रसिध्द पर्यावरणविद् श्रीमती मेनका गांधी के दूरदर्शन कार्यक्रम में इस विषय को उठाया गया।

'ब्लड फार गाड' को लेखबद्ध करने वाले पत्रकार तपेश जैन कई साल तक लोकल न्यूज चैनल के कापी एडीटर रहे और उन्होंने उस दौरान कई डॉक्युमेंट्री फिल्में लिखी और फिर स्वंतत्र रूप से टेली फिल्म और वृत्त चित्र निर्माण प्रारंभ किया। किसी एक विषय पर तीन तीन वृत्त चित्र का निर्माण उन्होंने किया है।

वे बताते हैं कि वे नक्सलवाद के खिलाफ आदिवासियों के 'शांति अभियान- सलवा जुडूम' पर उन्होंने तीन अलग-अलग वृत्त चित्र का निर्माण किया है। पहली बार बनी डॉक्युमेंट्री केबल टीवी पर प्रसारित हुई वहीं भोपाल में हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में कार्यकर्ताओं को यह फिल्म दिखाई गई।

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने भी यह फिल्म देखी और इसकी सराहना की। दूसरी फिल्म भारतीय जनता पार्टी के मुंबई के राष्ट्रीय अधिवेशन में 'सलवा जुडूम-शांति अभियान' दिखाई गई और तीसरी 'दह उठा बस्तर' प्रधानमंत्री और उप राष्ट्रपति को वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ताओं ने दिखाई हाल ही में पर्यटन पर आधारित वृत्त चित्र 'छत्तीसगढ़-एक झलक' का निर्माण एवं निर्देशन करने वाली संस्था लोकमान्य सद्भावना समिति के अध्यक्ष का कहना है कि वे वृत्त चित्रों को अलग अंदाज में प्रस्तुत करते हैं।

गीत संगीत के साथ ही लोगों की बातचीत इन वृत्त चित्रों में शामिल होती हैं। जिससे वृत्त चित्र मनोरंजक बन पड़ते हैं। बिना किसी प्रोडक्शन हाऊस के अब तक 20 डॉक्युमेंट्री फिल्म एक टेली फिल्म 'डेहरी के मान' तो विज्ञापन फिल्म के लेखक निर्देशक निर्माता तपेश जैन स्वाल के जवाब में बताते हैं   कि यह सब माँ बम्लेश्वरी के आर्शीवाद से ही संभव हो सका है। किराए की कैमरा टीम, फिर कॉन्ट्रेक्ट पर एडिटिंग करना श्रम साध्य एवं बेहद मुश्किल काम है।

हालांकि वीडियो एलबम भी इसी अंदाज में बन रहे हैं लेकिन डॉक्युमेंट्री फिल्मों के लिए फुटेज जुगाड़ करना सबसे बड़ी समस्या है। फिर डॉक्युमेंट्री फिल्मों का कोई बाजार भी नहीं है।

 सरकारी विभाग या बड़े संस्थानों द्वारा इनका निर्माण योजना एवं अपने प्रोजेक्ट के लिए किया जाता है। बिना किसी शासकीय सहयोग के जनहित के मुद्दों पर डॉक्युमेंट्री फिल्मों का निर्माण घाटे का काम है बावजूद इसके तपेश जैन इस काम में जुटे हुए हैं। वे कहते हैं कि उन्हें एक जुनून है।

इसके तहत सलवा जुडूम को छत्तीसगढ़ की पहली विज्युअल न्यूज सर्विस ईएनएसआईटीवी में शामिल करवाया।

 इंटरनेट पर उपलब्ध इस वृत्त चित्र के साथ ही ' छत्तीसगढ- एक झलक' ने भी देश विदेश के लोगों को घर बैठे छत्तीसगढ़ दर्शन का अवसर प्रदान किया है। 'तीर्थयात्रा डोंगरगढ़ की' में डोंगरगढ़ को अलग अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। यह वृत्त चित्र भी जल्दी ही नेट पर दिखाई पड़ेगा।

इसमें डोंगरगढ़ में स्थापित माँ  बम्लेश्वरी की कथा के साथ ही मूंछवाले हनुमान जी एवं विशाल बुध्द प्रतिमा वाले प्रज्ञागिरी के साथ ही कई रहस्यों का खुलासा किया गया है। हाल ही में उन्होंने 'जय माँ बम्लेश्वरी दंतेश्वरी- महामाया ' का निर्माण किया है। ये वृत्तचित्र भी बेहद पसंद किया जा रहा है।

 श्री जैन बताते हैं कि तथ्यों की खोजबीन के बाद बनी डॉक्युमेंट्री फिल्में लोगों को खूब पसंद आती है और उसकी बेहद प्रशंसा की जाती है। तीर्थयात्रा डोंगरगढ़ की केबल टीवी नेटवर्क पर पचास से ज्यादा बार प्रसारित हो चुकी है और इस देवी भक्ति से लोकमान्य सद्भावना समिति को अलग ही मुकाम हासिल हुआ है।

 बहरहाल छत्तीसगढ़ में डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाने वाले बिरले ही लोग हैं। संसाधन और रूचि बढ़ने से इस क्षेत्र में और भी लोग आयेंगे नए-नए प्रयोग से भी डॉक्युमेंट्री फिल्में अब उबाऊ की बजाए रोचक बन पड़ रही है।
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