Tue, 01 Jun 2010 23:17:00 +0000 जन सहयोग से शुरू हुआ तालाब गहरीकरण का कार्य
जिला कलेक्टर श्री निर्मल कुमार खाखा की अपील पर शहर के गण्मान्य नागरिकों ने आज प्रात: 07.00 बजे से स्थानीय मेला भाठा स्थित कंकालीन तालाबर् दुधावा तालाब ञ के गहरीकरण के लिए श्रमदान करना प्रारम्भ किया।
36गढ़ डाट इन
उत्तर बस्तर कांकेर,1 जून(36गढ़ डाट इन) जिला कलेक्टर श्री निर्मल कुमार खाखा की अपील पर शहर के गण्मान्य नागरिकों ने आज प्रात: 07.00 बजे से स्थानीय मेला भाठा स्थित कंकालीन तालाबर् दुधावा तालाब ञ के गहरीकरण के लिए श्रमदान करना प्रारम्भ किया।
विधायक कांकेर श्रीमती सुमित्रा मारकोले, नगरपालिका अध्यक्ष श्री पवन कौशिक की उपस्थिति में शहर के प्रबुध्द नागरीकों ने कंकालीन तालाब में गहरीकरण का कार्य प्रारंभ किया।
जिला कलेक्टर श्री निर्मल कुमार खाखा, पुलिस अधीक्षक श्री अजय यादव, सी ई ओ जिला पंचायत श्री अंकित आनंद, अपर कलेक्टर श्री एम एल धृतलहरे, एस डी एम कांकेर श्री बी एस उईके, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास श्री भोई, जिला शिक्षा अधिकारी श्री आर एन हीराधर, डी पी सी राजीवगांधी शिक्षा मिशन बृजेश बाजपेई, ई ई पी डब्लु डी श्री एल एल पैंकरा।
ई ई पी एच ई श्री एम एस मरकाम, डी एफ ओ कांकेर श्री जे आर नायक, उप संचालक कृषि श्री कपिल देव दीपक सहित समस्त जिला स्तरीय अधिकारियों और राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ ही पत्रकारों ने भी गहरीकरण कार्य हेतु श्रमदान किया।
ज्ञातव्य है कि शहर के मडई भाठा में स्थित कंकालीन मंदिर के बाजू से लग कर कंकालीन तालाब है। यहाँ कई वर्षो से दूर्गा प्रतिमा, गणेश प्रतिमा, और जंवारा आदि का विसर्जन किया जाता है।
पहाडी से उतने वाले वर्षा जल को रोकने, जनता के निस्तार संबंधी जरूरतों को पूरा करने और भूजल स्तर को बढाने के लिए कांकेर रियासत के महाराजा श्री कोमलदेव ने लगभग 1940 के पूर्व 16707 वर्ग मीटर के क्षेत्र में दुधावा तालाब का निर्माण करवाया था।
जिसे कंकालीन तालाब के नाम से जाना जाता है। इस तालाब से कुछ दूरी पर रजबंधा तालाब था। जहाँ पर कंकालीन तालाब में जमा वर्षा का जल नाले के द्वारा पहूँचता था जहाँ आज नए बस स्टैण्ड का निर्माण्ा किया गया है।
इस तालाब के विषय में रोचक किवदन्तियाँ प्रचलित है कि किसी साधु ने अपने जानवरों को चराने के बदले चरवाहे को पारस पत्थर दिया था। जिसे उस चरवाहे ने मामूली पत्थर समझ कर कंकालीन तालाब में फैंक दिया।
इसकी जानकारी होने पर महाराजा ने हाथी के पैरों में सांकल बांधकर तालाब में उतारा, सांकल के एक हिस्से का स्पर्श पारस पत्थर से हुआ और वह हिस्सा सोने का बनगया। यहाँ मच्छली मारने का काम नहीं किया जाता।
यदि कोई मच्छली मारने के लिए जाल डालता है तो जाल में एक भी मच्छली नहीं फसती साथ ही जाल डालने वाले का अहित हो जाता है। और इस तालाब में कभी काई नहीं जमती है।
प्राचीन महत्तव के इस कंकालीन तालाब के संरक्षण की पहल करके जिला प्रशासन ने जल संवर्धन के दिशा में महत्तवपूर्ण कदम उठाया है। इस अभियान को और आगे बढाने और कंकालीन तालाब को अपना मूल स्वरूप्
दिलवाने के लिए प्रशासन के साथ ही कंकेर नगर के वासियों को भी कंधे से कंधा मिलाना होगा।
ना केवल कंकालीन तालाब वरन पानी के समस्त स्रोंतो के संरक्षण के लिए उसका उपयोग करने वाले हर नागरीक को स्वप्रेरित हो कर आगे आना होगा। जल संरक्षण के उपायों को अपनाना होगा।
ताकी आने वाली पीढी को निर्मल और स्वच्छ विरासत के रूप में अगाध जल से भरे हुए स्रोते प्राप्त हो सके। जल संरक्षण संवर्धन की दिशा में आज बढाया हुआ एक कदम आने वाली कई नस्लों के लिए प्रेरणा बन कर उनका जीवन संवारती रहेगी। 36गढ़ डाट इन
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